Bachpan ke sunehre din or yaade – बचपन के सुनहरे दिन और यादें

Bachpan ki yade – बच्चे सोचते हैं कि हम कब बड़े हो जाएं और जब बड़े हो जाते हैं तो यह सोचते हैं कि काश हम छोटे होते।

कुछ भी हो सबसे प्यारा तो बचपन ही होता है। बचपन के दिनों की कुछ अपनी बहुत प्यारी प्यारी यादें हैं। ना कमाने की टेंशन, ना खाने की टेंशन, ना किसी झगड़े की टेंशन, ना किसी किसी का बुरा मानने की टेंशन। बस खेल में ही बीत जाता है सारा बचपन। वैसे तो पढ़ाई में भी जाता है।

bachan in hindi

Bachpan का समय सबसे अच्छा समय होता है जब हम एक से 3 – 4 साल के होते हैं, वह सबसे प्यारा समय होता है। उसमें हमें पढ़ाई नहीं करनी होती केवल मस्ती मस्ती मस्ती। हमारे ध्यान रखने वाले, हमार हमें देखने वाले बहुत से लोग होते हैं।

सब हमारा ध्यान रखते हैं और सबका ध्यान हमारी तरफ ही होता है। 2 – 3 – 4 साल तक हमें अपनी याद नहीं होती है। यह कह सकते हैं कि उस समय हमारे ऊपर कोई जिम्मेवारी नहीं होती।

सब चीजें यानि के हमारे कपड़े, खिलौने, खाने का सब कुछ हमारे मां-बाप ही हमारे लिए लाते हैं। हमें कोई भी चीज पसंद हो वह हमारे लिए लेकर आ जाते हैं फिर उसके बाद आगे जिंदगी बढ़ती है।

फिर हम स्कूल की तरफ जाते हैं जहां पर हमें बहुत सी चीजें दिखाई जाती हैं यानी कि सबसे पहले शुरुआत हम मान ले तो एबीसीडी या फिर आ से अनार यह सब सीख कर हम करते हैं टीचर और स्कूल टाइम इतना अच्छा होता है ना कि हम भूल नहीं सकते।

गांव की बचपन की यादें

तब हमें धीरे-धीरे हमारी याददाश्त एकदम स्ट्रांग हो जाती है कि हम कब स्कूल गए थे हमारी पहली टीचर कौन थी वह हमें याद रहता है। क्योंकि उनसे इतना प्यार मिलता है।

उस समय की कुछ अपनी अलग ही यादें हैं। आगे बढ़ते जाएं तो पहली कक्षा से लेकर पांचवी कक्षा तक तो हमें मजे ही मजे। हम लोग पढ़ाई में ध्यान देते हैं बट ज्यादा मजे करने में खेलने में ज्यादा ध्यान होते हैं।

असली पढ़ाई तो हमारी 6th क्लास से स्टार्ट हो जाती है, जब हमें पढ़ाई पर ध्यान ज्यादा देना पड़ता है और खेलने में कम। मगर जो बचपन के खेल होते हैं जैसे क्रिकेट और छुपन छुपाई।

जब हम स्कूल से छूटते थे तो अलग अलग तरीके के खाने वाले ठेला लगा के खड़े रहते थे। मतलब बेचने वाले टॉफी हरि टॉफियां चिंगम बहुत से अलग-अलग चीजें खाने की थी जो मैं हम लोग खरीदते थे। बचपन को हम नहीं कभी भूल सकते हैं।

अगर बचपन हमने अच्छे से जिया है तो हमारा वह लाइफटाइम बन जाता है और सबसे इंपॉर्टेंट हमारे दोस्त बचपन के दोस्त अगर हमारे साथ हमेशा साथ दे हमारा तो वह और अच्छा बन जाता है।

उसके बाद तो जिंदगी में हमें राही चुननी पड़ती है जैसे कि 10th क्लियर करो सब्जेक्ट देखो कौन सा लेना है। 12th क्लियर करो फिर कौन सा सब्जेक्ट लेना है।

उसके बाद तो जिंदगी हमारी एक तरह से एक कंपटीशन बन जाती है हमें यही सिखाया जाता है अगर आप पढ़ोगे नहीं तो फिर आपको अच्छा करियर नहीं बनेगा।
अगर आप ध्यान नहीं दे पाओगे। यह सब चीजें।

मगर मेरा मानना यह है जो आपको अच्छा लगे वही करना चाहिए। और अपना बचपन (Bachpan) कभी नहीं भूलना चाहिए क्योंकि वह बहुत मीठी मीठी यादें होती हैं। आपको जब भी समय मिले तो अपने बचपन को जीने की कोशिश करो।

Bachpan का समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसीलिए बचपन भी हमारा पीछे छूट जाता है। हम बचपन को इसलिए अच्छा मानते हैं क्योंकि हमारे पास कोई जिम्मेवारी नहीं होती टेंशन नहीं होती इसलिए मैं अपने बचपन को बहुत प्यारा समय मानते हैं।

हमें अपने बच्चों को भी सिखाना चाहिए अपना बचपन आप खुशी से जियो मैंने कई कहानियां सुनी है इस से रिलेटेड की कई बच्चे अपना बचपन खो देते हैं अपने मां-बाप की वजह से या अपने आस-पड़ोस की वजह से या अपने पर्यावरण की वजह से, तो बचपन (Bachpan) सबका प्यारा होना चाहिए और मां-बाप को यह सोचना चाहिए कि उनके बच्चे से बढ़कर कोई नहीं है।

बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं जो अपने बचपन को ठीक से जी नहीं पाते उनके मां-बाप आपस में तलाक ले लेते हैं या फिर झगड़े करते हैं जिससे कि उनके बच्चों के ऊपर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। जिस हिसाब से बचपन जीना चाहिए वह नहीं जी पाते यानी कि उनकी खुशियां अपने मां-बाप को देखकर खत्म हो जाती हैं।

ऐसे बच्चे बड़े होकर हमेशा अपने मन में नकारत्मकता को रखते हैं क्योंकि उन्होंने अपने घर में झगड़ा और लड़ाई ही देखी होती है कभी खुशियां तो देखि ही नहीं होती है। वह सोचते हैं कि लोगों के घर में खाली दुखी ही होते है, खुशियां तो होती नहीं।

माँ-बाप को अगर पहले से पता है कि साथ नहीं रह सकते यानी एक दूसरे के साथ नहीं रह सकते तो शादी ही नहीं चाहिए। पहले अपने आप एक दूसरे को समझने का जिससे आपके बच्चे की जिंदगी खराब ना हो। उस को भी बचपन जीने का हक है जैसे आपने जीया है तो वह भी जीना चाहता है।

आपने कैसा अच्छा बचपन जिया है अगर आपके साथ बुरा होता है तो अपने बच्चे के साथ वह मत होने दो। उसकी जिंदगी अच्छी रखो। और जब भी आपको समय मिले तो उसके साथ समय बताओ जिसे आप भी अपना बचपन जी सको। यानी कि कहते हैं ना बच्चे के साथ बच्चे बन जाना। तो यही बात कहते हैं कि बचपन सबसे प्यारा होता है।

आज का समय तो ऐसा है कि बच्चे खेलने की बजाए, बाहर जाने की बजाय वह घर में ही MOBILE, COMPUTER , LAPTOP, i POHONE और TV इन सब में लगे रहते हैं।

पहले कितने अच्छे-अच्छे खेल होते थे ,कबड्डी, छुपन छुपाई और लंगड़ी टांग। बहुत से खेल ऐसे होते थे जो हम खेलते थे और जब घर की लाइट चली जाना तो सब गली के बच्चे रात को इकट्ठा होकर गेम खेलते थे।

संगीत बजाते और गाना गाते, अंताक्षरी खेलते थे। आजकल यह चीज नहीं रही। सबके अपने प्रिय खेल होते थे बच्चे क्रिकेट खेलते थे, एक दूसरे की एक दूसरी टीम बनाते थे और बहुत से प्यारे-प्यारे खेल खेलते थे जो कि अब सिर्फ यादों में रह गए हैं।

मोबाइल टीवी यह सब आने की वजह से बच्चे इन्हीं में ही अपना समय बिताते हैं। वह कहीं नहीं जाते। उन्हें लगता है हमारी दुनिया मोबाइल तक ही सीमित है यानी कि क्या खेलने जाना मोबाइल में ही इतनी चीजें आ चुकी हैं कि बच्चे मोबाइल में ही सब देखते हैं।

बहुत याद आता है बचपन (Bachpan)

जिससे कि वह अपने शरीर को भी खराब कर रहे हैं और बहुत सी प्रॉब्लम को जन्म दे रहे हे। अगर कही क्रिएट हो रही हैं तो वह खेलने भेजे। उन्हें समझाइए की उनके साथ लूडो के खेले।

अगर आप घर में बंद है किसी प्रॉब्लम की वजह से तो घरवाले खेल जो इंडोर गेम कहते हैं वह खेल खेले। जैसे लूडो, सांप सीढ़ी यह भी बहुत अच्छी गेम है। हमने बचपन (Bachpan)  में बहुत खेली है और आप जानते हैं कि जितने बच्चे मोबाइल से थोड़ा दूर रहेंगे उतना उनको ही फायदा है।

जैसे की जयादा मोबाइल से आंखें खराब होती हैं और मानसिक समस्या भी होती है और चीड़चिड़ा पन गेम हरने की वजह से वह अलग। आप भी यह सब अच्छे से जानते हैं की मोबाइल की आदत ज्यादा अच्छी नहीं है।

आपने अपने बचपन (Bachpan) की यादों को संजोया है ऐसे ही आप कोशिश कीजिए कि आपके बच्चे संजो कर रखें यानी उन्हें याद रहे हम यह गेम खेलते थे, कबड्डी खेलते थे, लंगड़ी टांग खेलते थे। जब से हम घर में बंद हो गए हैं तब से हम बहार के खेल तो नहीं खेल सकते मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि घर में भी हम बहुत सारे खेल खेल सकते हैं।

जब हम छोटे थे तो एक समय ऐसा भी था जब हम पूरे 4 – 5 घर मिलकर एक बड़ी फिल्म लगाया करते थे और सब एक साथ मिलकर फिल्म देखते थे तो वह मजे भी बड़े अच्छे मजे होते थे।

उन दिनों दिवाली साथ में मनाते थे तो आजकल तो त्यौहार का कोई मतलब ही नहीं रह गया। सब अपने में ही मगन रहते हैं। पहले तो एक दूसरे के घर मिठाई देने जाते थे दिवाली पर। होली पर रंग लगाने जाते थे। और ईद पर तो हमारे घर पर कार्ड और सेवई भी आती थी पर आज के समय में तो सब लोग भूल ही गए।

एक दूसरे के साथ त्यौहार मनाते थे और क्रिसमस भी हम साथ में सेलिब्रेट करते थे। नए साल के लिए पैसे ईकखट्टे करना, मोहल्ले में पार्टी करना इंजॉय करना, डांस होता था और गाने चलते थे। अब यह सब तो धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है।

bachpan kee yaaden par nibandh

इन सब बातों में हमारे साथ बड़े भी साथ में रहते थे। समय बदलता जा रहा है मगर हमें पुरानी चीजें कहीं छोड़नी नहीं चाहिए क्योंकि अगर हम पुरानी चीजें बिलकुल छोड़ देंगे तो हम अपने आप को भी भूल सकते हैं।

इसलिए कोशिश करें कि जो जिंदगी आपने बचपन (Bachpan) में जीये है वैसे ही जिंदगी आपके बच्चों को सुनाइए और बताइए कि हम ऐसे काम करते थे, ऐसे खेलते थे, ऐसे यह वाले गेम खेलते थे आदि आदि।

उनको वह गेम दिखाइए जिससे कि आपका बचपन भी ताजा होगा और वह भी कुछ नयी चीजें सीखेंगे। पहले के जमाने में बच्चों में पूर्ति होती थी क्योंकि वह अलग-अलग तरह के शारीरिक गतिविधियाँ करते थे। यानी कि खेलते थे। तो अपनी बचपन (Bachpan) की यादों को जो समेटा हुआ है वह अपने बच्चों को बताइए और उनके साथ भी आपकी भी बचपन की यादें ताजा हो जाए। आप भी ख़ुश और आनंदित हो जायेंगे।

बचपन की सुनहरी यादें

कुछ यादें ऐसी है हमारे बचपन (Bachpan) की के टीवी में आने वाले हर एक TV SHOW या कुछ धारावाहिकों जैसे कि SHAKA LAKA BOOM BOOM, SHAKTIMAAN, ALIF LAILA और खास करके रामायण और महाभारत जैसे इतनी बहुत बढ़िया सीरियल आती थी के अगर हम एक बार देखने बैठ जाए तो ऐसा मन करता था कि अब खड़े ही ना हो।

SHAKTIMAAN की सीरियल में तो वह जैसे गोल-गोल घूमकर कहीं पर भी उड़ कर चला जाता था वह सीन देखना तो इतना अच्छा लगता था कि बस उसे देखते रहे और कई बार तो हम खुद भी गोल गोल घूम के नीचे गिर जाते थे।

वह SHAKA LAKA BOOM BOOM वाली पेंसिल ऐसी थी के हम उससे जो भी चित्र बनाते थे वह हमारे सामने आ जाता था। यह हम सीरियल में देखते थे उसके बाद हम दुकान में वही पेंसिल ढूंढने जाते थे लेकिन वह मिलती नहीं थी क्योंकि वह सिर्फ एक सीरियल थी लेकिन उसका भी मजा कुछ और ही था।

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